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कविता : मुद्दें

मुद्दें

छोटे-छोटे मुद्दों पर उमड़ती ये बड़ी रैलियाँ
शहर-ए-हालात बयाँ करती है
अब तक तुमने जो देखा है
सच वही है,ना पुछ सत्ता मे आकर
सरकारें क्या करती हैं
पर्दानशीं हो जातीं हैं खबरें काम की
और तुम्हे भी खबर है इधनो से प्रेरित
चंद समाचारे क्या करती हैं
थोड़ा उथल-पुथल होता है
शहर के दर-दरिचों मे
लेकर शब्द इंकलाब,खड़े हो जातें है
दो-चार लोग कहीं किसी बाग बगीचों मे
इससे वाकिफ होकर भी की
आम आदमी की इख्तीयारें क्या करती हैं।

-स्वाभिमान

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