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कविता: बिका नहीं एक उम्र तलक

मैं तुम और कविता

बिका नहीं एक उम्र तलक
इस तरह टूटा है कोई
साहिल पे समंदर फेंक गया
एहसासों का मलबा है कोई
परछाईं से बातें करता
भीड़ में भी तन्हा है कोई
साखों से तकसीम हुआ
फिर सदमें में रहता है कोई
धुआँ धुआँ सा मुस्तकब़िल ये
ये जान के भी जिंदा है कोई
पुरनूर रात की चाहत में
सदियों से नहीं सोया है कोई
किस किस से भागें,जाए कहाँ
धड़कन तक में बैठा है कोई
अबसार पे उसके पर्दा है
जिसके लिए लिखता है कोई
-SWABHIMAN –

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